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10 साल की मंजूरी पर अचानक ब्रेक: 89 छात्राओं के भविष्य पर लटकी तलवार, हाईकोर्ट पहुंचा रुड़की कॉलेज…(पढ़िए खबर)

सुसाना मेथोडिस्ट गर्ल्स बी.एड. कॉलेज, रुड़की ने खटखटाया हाईकोर्ट का दरवाजा

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क्लिक उत्तराखंड:-(ब्यूरो) मेथोडिस्ट गर्ल्स बी.एड. कॉलेज, रुड़की ने Hemwati Nandan Bahuguna Garhwal University के खिलाफ कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।

फाइल फोटो

आरोप है कि विश्वविद्यालय ने 10 साल से जारी प्रवेश प्रक्रिया को अचानक अवैध करार देकर 89 छात्राओं के एडमिशन पर रोक लगा दी,कॉलेज का कहना है कि 2014 से विश्वविद्यालय की अनुमति और निगरानी में ही प्रवेश होते रहे, लेकिन “समर्थ पोर्टल” लागू होने के बाद यू-टर्न ले लिया गया।

10 साल तक सब ठीक, अचानक ‘अवैध’ कैसे?……

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मामले के तथ्यों के अनुसार, वर्ष 2014 में विश्वविद्यालय ने उक्त अल्पसंख्यक संस्थान को औपचारिक रूप से अपनी प्रवेश परीक्षा आयोजित करने की अनुमति प्रदान की थी। इसके बाद 2014 से 2024 तक लगातार एक दशक तक यही प्रक्रिया लागू रही। इस अवधि में विश्वविद्यालय न केवल इस प्रक्रिया से अवगत था।

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बल्कि उसने स्वयं पर्यवेक्षक नियुक्त कर प्रवेश प्रक्रिया की निगरानी और अनुमोदन भी किया। इसी प्रणाली के अंतर्गत एक हजार से अधिक छात्राओं को प्रवेश दिया गया, जिन्होंने विश्वविद्यालय की परीक्षाओं में भाग लेकर विधिवत डिग्रियां प्राप्त कीं।

“समर्थ पोर्टल” बना विवाद की जड़…..

विवाद की शुरुआत वर्ष 2024 में “समर्थ पोर्टल” लागू होने के बाद हुई। याचिका में यह स्पष्ट किया गया है कि इस पोर्टल में अल्पसंख्यक संस्थानों के लिए प्रवेश का कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है।

इसके बावजूद विश्वविद्यालय ने इसे आधार बनाकर शैक्षणिक सत्र 2025–27 में प्रवेशित 89 छात्राओं को मान्यता देने से इनकार कर दिया। कॉलेज का कहना है कि यह निर्णय न केवल मनमाना है, बल्कि समानता का अधिकार और अल्पसंख्यक संस्थानों के अधिकार का प्रत्यक्ष उल्लंघन भी है।

विधि विशेषज्ञ एवं लॉ एण्ड जस्टिस सोसाइटी के सदस्य कृष्णकान्त…

न्याय पाने के लिए संस्थान ने लॉ एण्ड जस्टिस सोसाइटी के सदस्य कृष्णकांत के कार्यालय का रुख किया, जहां विस्तृत कानूनी परामर्श और दस्तावेज़ों के विश्लेषण के पश्चात उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय, नैनीताल में याचिका दायर की गई। इस याचिका में विश्वविद्यालय के आदेश को चुनौती दी गई है, जिसमें उक्त छात्राओं को प्रवेश को अस्वीकार किया गया था।

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याचिका में यह भी उल्लेख किया गया है कि इससे पूर्व इसी विवाद को लेकर न्यायालय ने विश्वविद्यालय को मामले पर नए सिरे से विचार करने का निर्देश दिया था, किन्तु आरोप है कि विश्वविद्यालय ने बिना वास्तविक पुनर्विचार के अपने पुराने रुख को ही दोहराते हुए आदेश पारित कर दिया, जो प्रशासनिक निष्पक्षता और विधिक सिद्धांतों के विरुद्ध है। फिलहाल पूरा मामला हाईकोर्ट में विचाराधीन है और सभी की निगाहें नैनीताल स्थित हाईकोर्ट पर टिकी हैं। आने वाला फैसला न सिर्फ इन छात्राओं की किस्मत तय करेगा

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