18 साल बीतने के बाद दरगाह दान गोलको को आज तक नहीं मिला अपना रहनुमा, कोषाधिकार विभाग में धूल फांक रही दान गोलके
2007 में लाखों रुपए की हेराफेरी में सील की गई थी दान की गोलके, कई जिम्मेदारों के ऊपर गिरी थी गाज.... Exclusive Special Story

क्लिक उत्तराखंड:-(बुरहान राजपूत) 13वीं शताब्दी के चिश्ती सिलसिले के सूफी संत हजरत मखदूम अलाउद्दीन अली अहमद साबिर पाक पूरी दुनिया में सब्र, भूखों को खाना खिलाने और अपने कई करिश्मो से मशहूर हैं।

जिसके चलते वर्षों पुरानी चली आ रही परम्परा आज भी जिंदा हैं। सदियां बीत जाने के बाद भी आज भी दरगाह साबिर पाक पर प्रतिदिन अकीदतमंद जायरीनों का हुजूम उमड़ता हैं। और जायरीन श्रद्धा से दान गोलको में दान का पैसा डालते हैं। वही अकीदतमंद जायरीन दरगाह में हाजिरी लगाकर रूहानियत का फैज हासिल करते हैं।

लेकिन साल 2007 में वक्फ दरगाहों की जिम्मेदारी संभाल रहे प्रबंधन तंत्र में उस वक्त हड़कंप मच गया था। जब दो दान गोलकों में दान के पैसे की गिनती में घोटाले का आरोप लगाया गया था, और गोलक कांड में घोटाले की बु आई थी। जिसके चलते हुए स्थानीय लोगों में आक्रोश पनप गया था और विरोध हुआ भी था।
जिसके बाद बढ़ते आक्रोश को देखते हुए तत्कालीन जिलाधिकारी आर०के०सुधान्सु और तत्कालीन वक्फ बोर्ड चेयरमैन चौधरी रहीश ने पूरे मामले की निष्पक्षता और गंभीरता से जांच कराई थी, तो उसमें बड़े पैमाने पर गोलक घोटाला उजागर हुआ था। गोलक कांड में तत्कालीन दरगाह प्रबंधक, तत्कालीन लेखाकार समेत कई कर्मचारीयों के ऊपर गाज गिरी थी।

दरगाह प्रशासन ने एक्शन लेते हुए 17 जुलाई 2007 को उनके खिलाफ कोतवाली रुड़की सिविल लाइंस में मुकदमा दर्ज कराया था। क्योंकि उस दौरान कलियर क्षेत्र सिविल लाइंस कोतवाली रुड़की के अधीन था, कोर्ट के आदेश के बाद दरगाह दान की दोनों गोलकों को सील कर रुड़की तहसील के कोष रखवा दिया था।
18 साल यानी करीब दो दशक बीतने के बाद भी दरगाह दान गोलको को आज तक अपना रहनुमा नहीं मिल पाया हैं। कोषाधिकार विभाग में सील कर रखवाई गई गोलके आज भी कार्यालय में धूल फांक रही हैं। जब हमारी क्लिक उत्तराखंड न्यूज की टीम ने गोलक के बारे जानकारी चाही तो विभाग में तैनात कर्मचारियों ने उसके बारे में कोई जानकारी देने से मना कर दिया।

बताया जा रहा है कि सील की गई गोलकों पर जंग लग चुका हैं। वही जानकार बताते हैं कि गोलकों में नोटबंदी से पहले वाले 1000 और 500 के नोट भी होंगे जोकि अब पूरी तरह से सड़ चुके होंगे या फिर उनको दीमक खा चुकी होगी।

बताते चलते हैं कि 18 साल के सफर में कई वक्फ बोर्ड चेयरमैन, जिलाधिकारी, ज्वाइंट मजिस्ट्रेट और दरगाह प्रबंधक आए। लेकिन इतने लंबे समय के बाद भी आज तक इन गोलकों को रिलीज कराने वाला कोई रहनुमा सामने निकलकर नहीं आया। जिसके कारण जायरीनों के दान का पैसा आज भी कैदी बनकर धूल फांक रहा हैं। जब इस संबंध में रुड़की ज्वाइंट मजिस्ट्रेट दीपक रामचन्द्र सेट और तहसीलदार/दरगाह प्रबंधक विकास अवस्थी से फोन पर बात करने का प्रयास किया गया तो दोनों अधिकारियों द्वारा फोन नहीं उठाया गया।



