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1903 में जली थी सेवा की यह लौ, उर्स में आने के लिए सूफियों को दिया जाता था न्यौता:

123 साल बाद भी पूर्वजों की परंपरा को निभा रहे हैं शाह सुहैल मियां.....(पढ़िए खबर)

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क्लिक उत्तराखंड:-(बुरहान राजपूत) “समय बदला, उर्स का रंग बदला, जायरीनों की तादाद बढ़ी, मगर लंगर की यह रवायत नहीं बदली” 123 साल बाद भी आज भी सातवीं तारीख को बड़े लंगर के जरिए साबिर पाक की चौखट से खिदमत, मोहब्बत और इंसानियत का पैगाम दिया जा रहा है। जिसको सज्जादानशीन के प्रतिनिधि शाह सुहैल मियां बखूबी निभा रहे हैं। साबिर पाक के 758वें सालाना उर्स की सातवीं तारीख पर शुक्रवार को कलियर की सरजमीं पर अकीदत, खिदमत और इंसानियत का अनोखा नजारा देखने को मिला। बड़े लंगर की रवायत के तहत गद्दियों और खानकाहों पर दस्तरख्वान सजाए गए और सूफियों, फकीरों, मस्त मलंगों के साथ दूर-दराज से पहुंचे हजारों जायरीनों तक लंगर पहुंचाया गया। लंगर की खुशबू से उर्स की फिजा महक उठी और हर तरफ साबिर पाक के नाम की अकीदत नजर आई। सज्जादानशीन शाह अली ऐजाज साबरी कुद्दूसी की सरपरस्ती और शाह सुहैल मियां साबरी की निगरानी में बड़े लंगर का इंतजाम किया गया। दरगाह के खादिम और मस्त मलंग अलग-अलग मुकामों पर पहुंचकर जायरीनों, फकीरों और अकीदतमंदों को लंगर तकसीम करते रहे। उर्स में उमड़ रही भीड़ को देखते हुए लंगर की मात्रा बढ़ाने की तैयारी भी शुरू कर दी गई है। लंगर इंचार्ज असलम कुरैशी के मुताबिक करीब 22 कुंतल आटा और 2 कुंतल 75 किलो दाल तैयार की जा रही है। जायरीनों की संख्या बढ़ने के साथ लंगर की व्यवस्था भी बढ़ाई जाएगी, ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों तक लंगर पहुंच सके। 12 रबीउल अव्वल यानी बड़ी रोशनी तक दोनों वक्त लंगर तकसीम होगा, जबकि बड़ी रोशनी के दिन दोपहर में एक वक्त लंगर बांटा जाएगा।

1903 में शुरू हुआ था सिलसिला, आज बना उर्स की पहचान…..

बड़े लंगर की यह रवायत 1903 में तत्कालीन सज्जादानशीन शाह अब्दुल रहीम साबरी के दौर में शुरू हुई थी। उस समय उर्स में आने वाले सूफियों और बाहर से आने वाले मेहमानों को दावत दी जाती थी। मेहमान अपने खेमे लगाकर उर्स में शरीक होते और दरगाह की जानिब से उनके लिए लंगर पहुंचाया जाता था। और दरगाह की ओर से उनको टैंट और वजू कराने के लिए मग (लौटे) उपलब्ध कराए जाते थे। साल दर साल यह रवायत मजबूत होती गई और आज बड़े लंगर की सातवीं तारीख उर्स के सबसे अहम पड़ावों में शुमार होती है। यहां दस्तरख्वान पर किसी की हैसियत नहीं पूछी जाती, सिर्फ अकीदत देखी जाती है। यही वह पैगाम है, जिसे साबिर पाक की चौखट से लंगर की इस रवायत के जरिए पीढ़ियों से आगे बढ़ाया जा रहा है.इस दौरान शाह यावर अली ऐजाज साबरी, शाह सुहैल मियां साबरी, असलम कुरैशी, यासिर मियां, नोमी मियां, अनमोल साबरी, रहीम साबरी, तसलीम साबरी, खालिद साबरी, मुनव्वर साबरी, अब्दुल रहमान, अब्दुल सत्तार और रफीक साबरी समेत बड़ी संख्या में अकीदतमंद मौजूद रहे।

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