
क्लिक उत्तराखंड:-(बुरहान राजपूत) सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेश के बावजूद न्यायिक कार्यवाही की लाइव-स्ट्रीमिंग के वीडियो और उनके क्लिप सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सार्वजनिक रूप से उपलब्ध रहने का मामला अब उत्तराखंड हाईकोर्ट की चौखट तक पहुंच गया है।
नेशनल पब्लिक सर्विस ट्रस्ट ने कृष्णकांत के माध्यम से इस मुद्दे को लेकर उत्तराखंड हाईकोर्ट में जनहित याचिका दाखिल कर केंद्र सरकार, उत्तराखंड सरकार और संबंधित सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए हैं
याचिका में आरोप लगाया गया है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा 24 जुलाई 2026 को जारी स्पष्ट अंतरिम आदेश के बावजूद न्यायिक कार्यवाही से संबंधित ऑडियो-वीडियो सामग्री का अनधिकृत प्रसार पूरी तरह नहीं रुक पाया है।
संस्था का दावा है कि उत्तराखंड हाईकोर्ट की लाइव-स्ट्रीमिंग से जुड़े वीडियो और क्लिप YouTube, फेसबुक, इंस्ट्राग्राम समेत विभिन्न डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अब भी उपलब्ध हैं। सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेश में अपेक्षित पूर्व अनुमति के बिना न्यायिक कार्यवाही की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग के प्रसार, पोस्टिंग, री-पोस्टिंग, अपलोडिंग, होस्टिंग और उससे मुद्रीकरण पर रोक लगाई गई थी।
ऐसे में याचिकाकर्ता ने सवाल उठाया है कि यदि आदेश प्रभावी रूप से लागू है तो प्रतिबंधित सामग्री डिजिटल प्लेटफॉर्म तक कैसे पहुंच रही है और वहां लंबे समय तक उपलब्ध कैसे रह रही है? नेशनल पब्लिक सर्विस ट्रस्ट ने हाईकोर्ट से मांग की है कि अनधिकृत वीडियो और क्लिप को तत्काल हटाने, उनके किसी भी प्रकार के मुद्रीकरण पर रोक लगाने और भविष्य में ऐसी सामग्री के दोबारा अपलोड होने से रोकने के लिए प्रभावी व्यवस्था बनाई जाए।
याचिका में आगे एक समान SOP, मजबूत तकनीकी निगरानी तंत्र और जिम्मेदारी तय करने की व्यवस्था लागू किए जाने की मांग की गई है, ताकि न्यायिक कार्यवाही से संबंधित प्रतिबंधित सामग्री के प्रसार पर समय रहते कार्रवाई हो सके। अब निगाहें हाईकोर्ट की सुनवाई पर टिकी हैं। गुरुवार को मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली खंडपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई होने की संभावना है। यदि अदालत इस मामले में कोई दिशा-निर्देश जारी करती है तो उसका असर न्यायिक कार्यवाही की डिजिटल रिकॉर्डिंग और सोशल मीडिया पर उसके प्रसार की निगरानी व्यवस्था पर पड़ सकता है।


