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सरकारी अस्पतालों में इलाज अधूरा, 52,942 मरीजों को दिखाया बाहर का रास्ता::

देहरादून सबसे आगे, 22,399 मरीज हुए रेफर; पहाड़ में बढ़ी चिंता, सुविधाओं की कमी पर उठे सवाल.....(पढ़िए खबर)

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क्लिक उत्तराखंड:-(बुरहान राजपूत) उत्तराखंड के सरकारी अस्पतालों में इलाज की सुविधाओं को लेकर सामने आए आंकड़ों ने स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। वर्ष 2025-26 में प्रदेश के सरकारी अस्पतालों से 52,942 मरीजों को बेहतर इलाज के लिए उच्चतर चिकित्सा केंद्रों में रेफर किया गया। इतनी बड़ी संख्या में मरीजों के रेफरल से अस्पतालों में डॉक्टरों, जांच और जरूरी उपकरणों की उपलब्धता को लेकर सवाल उठ रहे हैं। नेशनल पब्लिक सर्विस ट्रस्ट के सचिव प्रियांशु काम्बोज ने स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय से सरकारी अस्पतालों में मरीजों के रेफरल से जुड़ी जानकारी मांगी थी। इसके जवाब में मिले जिलावार आंकड़ों में यह बात सामने आई। आंकड़ों के मुताबिक देहरादून में सबसे ज्यादा 22,399 मरीज रेफर किए गए। ऊधमसिंहनगर में 4,407, नैनीताल में 4,395, चमोली में 4,271, पौड़ी गढ़वाल में 3,109 और हरिद्वार में 3,018 मरीजों को उच्चतर चिकित्सा केंद्र भेजा गया।

क्यों रेफर हुए इतने मरीज?……

नेशनल पब्लिक सर्विस ट्रस्ट के अध्यक्ष कृष्णकांत ने कहा कि सरकार को यह साफ करना चाहिए कि इतनी बड़ी संख्या में मरीजों को रेफर करने की जरूरत क्यों पड़ी। उन्होंने कहा कि हर अस्पताल में यह जांच होनी चाहिए कि मरीजों को किस वजह से आगे भेजा गया।उन्होंने कहा कि कहीं डॉक्टरों की कमी है तो कहीं जांच की सुविधा या जरूरी उपकरण उपलब्ध नहीं हैं। इन कमियों को दूर किए बिना सरकारी अस्पतालों में मरीजों को बेहतर इलाज मिलना मुश्किल है।

पहाड़ के मरीजों की बढ़ती परेशानी…..

कृष्णकांत ने कहा कि पर्वतीय और दूर-दराज के क्षेत्रों में रहने वाले मरीजों के लिए रेफरल बड़ी परेशानी बन जाता है। मरीज को इलाज के लिए दूसरे शहर तक जाना पड़ता है। इससे समय और पैसा दोनों खर्च होते हैं। गंभीर मरीजों के लिए लंबा सफर परेशानी और बढ़ा सकता है। नेशनल पब्लिक सर्विस ट्रस्ट ने शासन और स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय को पत्र भेजकर सरकारी अस्पतालों में मौजूद कमियों को दूर करने की मांग की है। ट्रस्ट ने कहा कि अस्पतालों में जरूरत के अनुसार डॉक्टर, जांच सुविधाएं और जरूरी उपकरण उपलब्ध कराए जाएं, ताकि मरीजों को छोटी-बड़ी बीमारी के इलाज के लिए बार-बार दूसरे अस्पतालों का रुख न करना पड़े।

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