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देश-विदेश

मोहर्रम मजलिस ए इमाम हुसैन शुरू: 6 जुलाई को होगा आशुरा का दिन, इस दिन दफन होंगे ताज़िए 

इमाम हुसैन की याद में मजलिस और जिक्रे शहीदाने कर्बला का सिलसिला शुरू....

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क्लिक उत्तराखंड:-(ब्यूरो) इस्लामिक कैलेंडर के पहले महीना यानी मोहर्रम के चांद का दीदार हो गया हैं। चांद के दीदार के साथ ही अगले दस दिनों तक शहर से लेकर देहात तक हजरत इमाम हुसैन की याद में मजलिस और जिक्रे शहीदाने कर्बला का सिलसिला शुरू हो गया है। इन कार्यक्रमों को लेकर शिया और सुन्नी समुदाय ने लोगो ने तैयारी पूरी कर ली है।

शिया समुदाय के लोग जहां दस दिन तक मजलिस, जुलूस और मातम कर कर्बला के शहीदों को याद करेंगे। वहीं सुन्नी समुदाय के लोग भी शहीदाने कर्बला का जिक्र करेंगे। वही जिले भर में अलग अलग स्थानों पर ताजिये बनने शुरू हो गए हैं।

करीब 1400 साल पहले हुई थी कर्बला की जंग….

इस्लाम के अनुसार, कर्बला की जंग करीब 1400 साल पहले हुई थी। कर्बला की जंग इस्लाम की सबसे बड़ी जंग में से एक है, क्योंकि इसमें इस्लाम के आखिरी पैगंबर मोहम्मद के नवासे इमाम हुसैन और उनके 72 साथी दीन ए इस्लाम को बचाते हुए करबला की सरजमी पर शहीद हो गए थे।

इस्लाम की जहां से हुई थी शुरुआत…..

मदीना से कुछ दूरी पर मुआविया नामक शासक का दौर था। मुआविया के इंतकाल के बाद उनके बेटे यजीद को शाही गद्दी पर काबिज होने का मौका मिला। कर्बला की जंग इसी अत्याचारी शासक यजीद के खिलाफ थी। यजीद का इस्लाम को लेकर अलग रुख था. वह इस्लाम धर्म को अपने अनुसार चलाना चाहता था। और इसी वजह से उसने पैगंबर मोहम्मद के नवासे हजरत इमाम हुसैन को भी अपने आदेशों का पालन करने के लिए कहा। यजीद ने कहा कि इमाम हुसैन और उनके सभी निस्बत और मोहब्बत रखने वाले उसे ही अपना खलीफा मानें। यजीद का मानना था कि अगर इमाम हुसैन ने उसे अपना खलीफा मान लिया तो वह आराम से इस्लाम मानने वालों पर राज कर सकता है। हालांकि, इमाम हुसैन को यह बिल्कुल भी मंजूर नहीं था. उन्होंने साफ तौर पर ऐसा करने से इनकार कर दिया. यजीद को ये इनकार नागवार गुजरा और उसने इमाम हुसैन और उनके साथियों पर जुल्म बढ़ा दिए। और साथ ही यजीद के जुल्म बढ़ते गए।

यजीद के जुल्मों को देखते हुए इमाम हुसैन ने अपने काफिले में मौजूद लोगों को वहां से चले जाने के लिए कहा. लेकिन कोई भी इमाम हुसैन को छोड़कर वहां से नहीं गया। मुहर्रम की 10 तारीख को यजीद की फौज ने हुसैन और उनके साथियों पर हमला कर दिया। यजीद बहुत ताकतवर था. यजीद के पास हथियार, खंजर, तलवारें थीं. जबकि हुसैन के काफिले में सिर्फ 72 लोग ही थे।

10 मोहर्रम को हजरत इमाम हुसैन और उनके साथियों को करबला में कर दिया गया शहीद….

मोहर्रम की 10वीं तारीख को यजीद की फौज और हजरत इमाम हुसैन के साथियों के बीच जंग छिड़ गई. यजीदी फौज काफी ताकतवर थी तो उसने इमाम हुसैन के काफिले को घेर लिया और उनका सभी को शहीद कर दिया। इस जंग में इमाम हुसैन के 18 साल के बेटे अली अकबर, 6 महीने के बेटे अली असगर और 7 साल के भतीजे कासिम का भी बेरहमी से शहीद कर दिया गया।

वहीं इमाम हुसैन के काफिले में शामिल परिवार वालों को भी बंधक बना लिया गया था। शहीद होने के बाद भी हजरत इमाम हुसैन ने इस्लाम को बचा लिया। और यजीद अपने मकसद में कामयाब नही हो पाया था। कर्बला की सरजमी पर अन्याय पर न्याय की जीत हुई। इसी लिए आज भी विश्व भर में हजरत इमाम हुसैन की शहादत को याद किया जाता हैं।

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